"AI की दुनिया में हमारे बच्चे: सुविधा मिल रही है या बचपन धीरे-धीरे स्क्रीन में खो रहा है?"
AI की दुनिया में हमारे बच्चे: सुविधा मिल रही है या बचपन धीरे-धीरे स्क्रीन में खो रहा है? क्या हम बच्चों को भविष्य के लिए तैयार कर रहे हैं… या अनजाने में उन्हें एक ऐसी दुनिया के हवाले कर रहे हैं, जिसे हम खुद अभी समझ ही रहे हैं? कुछ साल पहले बच्चे सवाल पूछते थे तो माँ-बाप के पास जाते थे। होमवर्क समझ नहीं आता था तो शिक्षक के पास जाते थे। मन उदास होता था तो दोस्त को फोन करते थे। आज एक और दरवाज़ा खुल गया है— AI का। एक ऐसा साथी जो कभी थकता नहीं, जवाब देने से मना नहीं करता और रात के किसी भी पहर उपलब्ध रहता है। यहीं से एक जरूरी सवाल जन्म लेता है— अगर मशीन हमारे बच्चों को जवाब देने लगे, तो क्या वह धीरे-धीरे उनकी जगह सुनने वाले इंसान की जरूरत भी कम कर देगी? AI अपने आप में दुश्मन नहीं है। यह पढ़ाई, जानकारी, creativity और problem-solving में बच्चों की मदद कर सकता है। लेकिन जब AI एक tool से आगे बढ़कर दोस्त, confidant या emotional companion बनने लगे, तब हमें रुककर सोचना जरूरी है। क्योंकि सवाल केवल यह नहीं है कि बच्चा AI से क्या सीख रहा है। सवाल यह भी है कि— AI के साथ रहते हुए बच्चा इंसानों से...